यह संस्कृत वाक्य सांख्य दर्शन (Sāṅkhya) के आरंभिक सिद्धान्त से जुड़ा हुआ है। यह सांख्य दर्शन का सर्व प्रथम सूत्र है,
शब्दार्थ
- अथ — अब / इसके बाद
- त्रिविध दुःख — तीन प्रकार के दुःख
- आध्यात्मिक (शरीर-मन से उत्पन्न)
- आधिभौतिक (अन्य प्राणियों/वस्तुओं से)
- आधिदैविक (प्राकृतिक/दैवी कारणों से)
- अत्यन्त निवृत्ति — पूर्ण एवं स्थायी निवृत्ति
- अत्यन्त पुरुषार्थ — मनुष्य का परम उद्देश्य
अर्थ
“अब, तीनों प्रकार के दुःखों की पूर्ण और स्थायी निवृत्ति ही मनुष्य का सर्वोच्च उद्देश्य है।”
दर्शनिक अर्थ
यह सूत्र बताता है कि दर्शन या ज्ञान का उद्देश्य केवल जानकारी पाना नहीं है, बल्कि मानव जीवन के मूल कष्टों से स्थायी मुक्ति पाना है।
सांख्य दर्शन के अनुसार जब तक ये तीन प्रकार के दुःख बने रहते हैं, तब तक जीवन में पूर्ण शान्ति संभव नहीं होती। इसलिए उनका पूर्ण नाश ही परम पुरुषार्थ (ultimate goal of life) माना गया है।
त्रिविध दुखों (तीन प्रकार के दुखों) की दृष्टि, जो वैदिक/सांस्कृतिक दर्शन में जीवन के दुखों को समझने का तरीका है। इसे तीन स्तरों में बाँटा जाता है।
१. अधिभौतिक दुख (भौतिक दुख)
- स्रोत: शरीर, परिवार, समाज, प्राकृतिक घटनाएँ
- उदाहरण: बीमारियाँ, भूख, गरीबी, प्राकृतिक आपदाएँ, युद्ध, संतान का संकट
- विशेषता: ये दुख बाहरी कारणों से उत्पन्न होते हैं और संसारिक जीवन से जुड़े हैं।
२. अध्यात्मिक दुख (आध्यात्मिक/मानसिक दुख)
- स्रोत: मन, इच्छा, वासनाएँ, अहंकार
- उदाहरण: क्रोध, ईर्ष्या, मोह, चिंता, तनाव, मानसिक पीड़ा
- विशेषता: ये दुख भीतरी कारणों से होते हैं और मन की अशुद्धि से जुड़े हैं।
३. अधिदैविक दुख (दैवीय/भाग्य से होने वाला दुख)
- स्रोत: भाग्य, कर्मफल, ईश्वर की इच्छा
- उदाहरण: जन्म-जन्मान्तर के कर्मों का परिणाम, अप्रत्याशित विपत्ति, मृत्यु
- विशेषता: ये दुख कर्म और भाग्य के परिणाम के रूप में आते हैं और मानव नियंत्रण से बाहर होते हैं।
त्रिविध दुखों की दृष्टि हमें सिखाती है कि जीवन में दुख सिर्फ बाहरी नहीं, बल्कि भीतरी और कर्मफल से भी उत्पन्न होते हैं। इसको समझना और उसके अनुसार जीवन जीना ही वैदिक/दर्शनिक शिक्षा है। वैदिक साहित्य मानव जीवन और चेतना के विकास को कर्म → उपासना → ज्ञान के क्रम में प्रस्तुत करता है। यानी बाहरी क्रिया से आंतरिक साधना और फिर अंतिम ज्ञान तक की यात्रा। परम्परागत रूप से वेद और उनसे जुड़े ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद ग्रंथ मानव जीवन और सत्य की खोज को तीन क्रमिक दृष्टियों में प्रस्तुत करते हैं। इसे ही त्रिविध दृष्टि कहा जा सकता है।
प्रकृति के त्रिगुणी स्वरूप में सत्त्व, रजस और तमस (ज्ञान, क्रियाशीलता और जड़ता) के साथ-साथ, मनुष्य को तीन प्रकार के कष्ट (तप) – आध्यात्मिक (स्वयं से उत्पन्न), आधिभौतिक (अन्य जीवों से), और आधिदैविक (दैवीय या प्राकृतिक शक्तियों से) अनुभव होते हैं, जिनका संबंध प्रकृति के इन गुणों के साथ-साथ बाहरी जगत से होता है, और इन्हें समझने व उनसे परे जाने के लिए विवेक और आत्म-ज्ञान आवश्यक है सृष्टि की हर चीज़ में ये तीनों गुण मौजूद होते हैं, बस उनकी मात्रा अलग-अलग होती है. ये तीनों ताप प्रकृति के गुणों (सत्त्व, रजस, तमस) और भौतिक जगत की जटिलताओं से उत्पन्न होते हैं. सांख्य दर्शन और योग के अनुसार, आत्मा इन सब से परे है,
सत्त्व : ज्ञान, प्रकाश, संतुलन, शांति और शुद्धता का गुण. यह उच्च चेतना और सद्गुणों से जुड़ा है. रजस : क्रियाशीलता, जुनून, इच्छा, गति और उथल-पुथल का गुण. यह भौतिक इच्छाओं और कर्मों को प्रेरित करता है. तमस : अंधकार, अज्ञान, जड़ता, आलस्य और विनाश का गुण. यह अज्ञान और मोह से जुड़ा है. और विवेक (सही ज्ञान) द्वारा प्रकृति से अपनी भिन्नता समझकर इन दुखों से मुक्ति (कैवल्य) प्राप्त की जा सकती है
सांख्य सूत्र १.१ की त्रिस्तरीय संक्षिप्त व्याख्या सारणी
| स्तर | अर्थ | स्पष्टीकरण / उदाहरण | लक्ष्य / उद्देश्य |
|---|---|---|---|
| अधिभौतिक (भौतिक, बाहरी) | शरीर और भौतिक दुःखों का निवारण | जैसे रोग, अकाल, गरीबी, प्राकृतिक आपदाएँ, शारीरिक कष्ट। | स्वस्थ और संतुलित जीवन प्राप्त करना। भौतिक सुख–दुःख से मुक्ति। |
| अधिदैविक (दैवी, नियामक) | प्राकृतिक और नियति-दुःखों से मुक्ति | जैसे समय, जन्म-मृत्यु चक्र, सामाजिक और कर्मफल से उत्पन्न पीड़ा। देवता, नियति और कर्म के नियम। | कर्म, धर्म और ब्रह्मांडीय आदेश के अनुरूप जीवन। आंतरिक और बाह्य संतुलन। |
| आध्यात्मिक (आत्मिक, चेतन) | आत्मा के दुःख और अज्ञान का निवारण | जैसे मोह, अभिमान, लोभ, अविद्या से उत्पन्न मानसिक और आध्यात्मिक पीड़ा। | मोक्ष, आत्मज्ञान, अति-परम पुरुषार्थ। अंतःशांति और पूर्ण मुक्ति। |


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