धर्मं, अर्थ और काम की प्राप्ति बिना परम पुरुषार्थ (मोक्ष) की प्राप्ति क्यों संभव नहीं है?


मनुष्य का जीवन केवल जन्म और मृत्यु के बीच की एक यांत्रिक यात्रा नहीं है। यह प्रश्नों, आकांक्षाओं, संघर्षों और अंततः शान्ति की खोज से भरा हुआ एक गहन अनुभव है। कभी वह सही–गलत के बीच उलझता है, कभी सफलता की दौड़ में स्वयं को खो देता है, तो कभी इच्छाओं की आग में जलता हुआ शान्ति को तरसता है। ऐसे में भारतीय दर्शन मनुष्य को कोई उपदेश नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण जीवन-नक़्शा देता है जिसे पुरुषार्थ कहा गया है। इसी कारण पुरुषार्थ को एक सफल जीवन का ब्लूप्रिंट कहा जाता है। ब्लूप्रिंट वह होता है जिसमें यह स्पष्ट होता है कि जीवन की इमारत कहाँ से शुरू होगी, किन स्तम्भों पर खड़ी होगी और उसकी पूर्णता किसमें है। पुरुषार्थ यही कार्य करता है।

पुरुषार्थ मानव जीवन के किसी एक पहलू को नहीं, पूरे मनुष्य को देखता है। यह आचरण देता है, यह स्थिरता देता है, यह संवेदना देता है, और अंततः शान्ति देता है, यह न भोग को ही सब कुछ मानता है, न त्याग को ही समाधान। यह संतुलन का दर्शन है। पुरुषार्थ हमें यह सिखाता है कि सफल जीवन वह नहीं है जिसमें केवल जीत हो, बल्कि वह है जिसमें अंतरात्मा शांत हो, मन संतुलित हो और दृष्टि स्पष्ट हो। इसलिए पुरुषार्थ कोई प्राचीन सिद्धान्त नहीं, बल्कि हर युग के मनुष्य के लिए एक जीवित, शाश्वत और सम्पूर्ण जीवन-नक़्शा है।

भारतीय दर्शन के पुरुषार्थ-सिद्धान्त का बहुत मूल और गम्भीर प्रश्न है। इसे क्रमबद्ध और सरल रूप में समझते हैं।

1. चार पुरुषार्थों का क्रम और अर्थ

भारतीय दर्शन में मानव-जीवन के चार पुरुषार्थ बताए गए हैं—

  1. धर्म – जीवन को सही दिशा देने वाला आचार, संयम और कर्तव्य
  2. अर्थ – जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक साधन और स्थिरता
  3. काम – इच्छाओं की संयमित और धर्मसम्मत पूर्ति
  4. मोक्ष – सभी बन्धनों और दुःखों से अंतिम मुक्ति

यह क्रम संयोगवश नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विकास के आधार पर है।

2. धर्म, अर्थ और काम बिना मोक्ष क्यों नहीं मिलता?
(क) असंतुष्ट जीवन में वैराग्य संभव नहीं

मोक्ष के लिए वैराग्य और विवेक आवश्यक है।
यदि मनुष्य ने जीवन की आवश्यकताएँ पूरी नहीं कीं (अर्थ), इच्छाओं को समझा और संतुलित नहीं किया (काम), तो उसका मन अतृप्त, अशान्त और असंतुलित रहेगा। ऐसा मन मोक्ष के मार्ग पर टिक नहीं सकता। क्योंकि अपूर्ण इच्छाएँ बार-बार मन को बाहर की ओर खींचती हैं।

(ख) धर्म के बिना अर्थ और काम बन्धन बन जाते हैं

धर्म मार्गदर्शक है। धर्म के बिना अर्जित अर्थ लोभ बनता है और धर्म के बिना किया गया काम आसक्ति बनता है और जो मनुष्य लोभ-आसक्ति से बंधन बढ़ता है, उसे कभी मोक्ष नहीं। इसलिए धर्म पहला पुरुषार्थ है।

(ग) अनुभव के बिना त्याग पलायन बन जाता है

यदि कोई व्यक्ति बिना जीवन जीए, बिना कर्तव्य निभाए, बिना अनुभव प्राप्त किए, सीधे मोक्ष की बात करे, तो वह परिपक्व वैराग्य नहीं, बल्कि पलायन होता है।

“भोगेभ्यः संन्यासः न तु अज्ञानात्।”
(भोगों को जानकर त्याग करना चाहिए, अज्ञान से नहीं)

(घ) चित्त की शुद्धि आवश्यक है

मोक्ष ज्ञान से मिलता है, और ज्ञान के लिए चाहिए शुद्ध चित्त

  • धर्म चित्त शुद्ध करता है
  • धर्मयुक्त अर्थ-काम मन को संतुलित करता है
  • शुद्ध और संतुलित चित्त आत्मज्ञान के योग्य बनता है

इसलिए मोक्ष अलग-थलग लक्ष्य नहीं, बल्कि धर्म, अर्थ और काम को सही ढंग से जी लेने का परिपक्व फल है। उसी तरह जीवन को धर्मपूर्वक जीने पर वैराग्य स्वाभाविक रूप से आता है और तभी मोक्ष संभव होता है। धर्म, अर्थ और काम को बिना जिए मोक्ष चाहना मानसिक असंतुलन, अधूरा वैराग्य, और आत्म-प्रवंचना बन सकता है। इसलिए धर्म मार्ग है, अर्थ और काम साधन हैं और मोक्ष उनकी परिपक्व परिणति है

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